Saturday, May 19, 2018

Hitler

                        हिटलर

                   अध्याय - तीन
                   बिक्रम से पंगा

घनी रात के बावजूद माहौल काफी अशांत लग रहा था जिसकी वजह थी उनलोगों की पदचाप जो तेजी से हाॅस्टल की गैलरी में बढ़ रहे थे।
वो पाँच लोग थे कुल मिलाकर जिनमें सबसे आगे हिटलर चल रहा था और उसकी ठीक पीछे बिक्रम भी आगे बढ़ रहा था जिसके होठों पर दबी मुस्कान साफ झलक रही थी जबकि उसके पीछे पैरों को घिसट-घिसट कर चल रहे भौतिक, मनदीप और जतिन की गर्दनें डर और शर्म से नीचे झुकी हुई थीं।
उनमें से किसी एक में भी इतनी हिम्मत नहीं थी कि एक दूसरे से आँखें मिलाकर देख सकें।
खैर एक के बाद एक करके तीन गैलरियाँ पार करने के बाद पाँचों लकड़ी के एक बड़े और पुराने दरवाजे के सामने रुक गये।
हिटलर ने अपने कोट की जेब से एक चाभी निकाली और अँधेरे में दरवाज़े का ताला खोलने लगा।लगभग तीस सेकेंड्स बाद हल्की सी क्लिक की आवाज़ के साथ ताला झूल गया और दरवाज़े को धक्का देकर खोलने के बाद एक-एक करके सब हिटलर के पीछे हो लिए।
कमरे में काफी अँधेरा था और पूरा कमरा उमस से भरा हुआ था।खैर बाकी सबको वहीं रुकने का इशारा देने के बाद आगे बढ़कर हिटलर ने बल्ब जला दिया जिससे पूरा कमरा बल्ब की पीली रौशनी में नहा गया।और बल्ब जलाने के बाद वो वापस उनकी ओर मुडा़ पर इससे पहले उसने अपना कोट उतारा और पास के कोट स्टेंड पर टांग दिया इसके बाद उसने हाथ में पकड़ी हुई बडी़ टार्च को थोड़ी दूर पर मौजूद लकड़ी के पुराने और धूल लगे मेज पर रख दिया।
और इसके बाद वो उनकी ओर मुडा़ और सबसे पहले  उसने सबके चेहरों की तरफ देखा।
एक तरफ जहां बिक्रम काफी गंभीर और हल्का खुश था वहीं भौतिक, मनदीप और जतिन नजरें जमीं को ओर झुकाये हुए थे।
"लड़कों मुझे एक वजह बताओ जो आधी रात को तुम्हें तुम्हारे बेड से इतनी दूर लेकर गई।"
हिटलर ने ठंडी और बेहद तीखी आवाज में सवाल किया जिसे सुनकर उनके शरीर में झुरझुरी सी दौड़ गई।
बहरहाल तीनों चुपचाप अपने-अपने जूते घूरते रहे और उनमें से किसी ने जरा सी भी आवाज नहीं निकाली।जबकि उनसे थोड़ी दूरी पर खड़ा बिक्रम उनको इस हालत में देखकर मन ही मन खुशी से नाच रहा था और ऐसा होता भी क्यों न दरसल अगर वे तीनों जो आज वहाँ हिटलर के सामने सिर झुकाकर खडे़ थे ये उसी की देन थी।
"भौतिक यहाँ देखो इधर!"
अंधेरे में टार्च की एक हल्की रौशनी तीनों में सबसे आगे चल रहे भौतिक पर पड़ी और उन तीनों ने उस फिरकी सी आवाको पहचान लिया।
वो शमा थी जो इस वक्त नीले नाइट सूट में किसी भूत की तरह लग रही थी और उसके साथ एक और लड़की भी थी जो कोई और नहीं बल्कि सफेद नाइट सूट में शालिनी ही थी।
"अर... हैप्पी बर्थ-डे शालिनी!"
भौतिक ने उनके पास पहुँचते हुए कँपकपाँते लहजे में कहा जबकि बिना कुछ बोले शालिनी ने अपना मुँह दूसरी ओर फेर लिया।
"हुँह!"
"हैप्पी बर्थ-डे शालिनी।"
भौतिक के पीछे से निकलकर बाकी दोनों ने आगे आते हुए कहा और उससे हाथ मिलाने के लिए अपना-अपना हाथ आगे बढा़ दिया।
शालिनी ने भी आगे बढ़कर गर्मजोशी के साथ उनसे हाथ मिलाया और तिरछी नजरों से भौतिक की ओर देखने लगी जैसे उसे चिढ़ा रही हो बहरहाल भौतिक बुरी तरह झेंप गया था।
"कम आॅन यार शालू तेरे बर्थ-डे पे तुझे विश करने के लिए बेचारा हिटलर से बचते-बचाते यहाँ तक आया है अब तो माफ कर दे।"
शमा ने उसे मनाते हुए कहा जबकि वो अपनी जिद पे अडी़ हुई थी।
"कभी नहीं!"
उसने साफ इंकार कर दिया हालांकि वो कुछ सोंच रही थी।
"अर... "
भौतिक ने कुछ बोलने की कोशिश की मगर शमा ने उसे बीच में ही रोक दिया।
"देख शालू हम सबको तो पता भी नहीं था कि आज तेरा बर्थ-डे था और इसने ही हम सबको यहाँ बुलाया था और सारा प्लान बनाया क्यों पुतिन सही है न।"
कहने के साथ ही शमा ने पुतिन को अजीब ढंग से घूरा।
"जतिन......अर....हाँ...अर...वो भौतिक ने ही हमें बताया था।"
जतिन ने कभी भौतिक तो कभी शालिनी को देखते हुए जवाब दिया।
"हाँ ये सच है और तो और इसने तुम्हारे लिए बडा़ सा फूलों का गुलदस्ता भी आर्डर दिया था।"
मनदीप ने उसकी चुटकी लेते हुए जवाब दिया।
"अच्छा पर मुझे तो कहीं कोई बुकेट नजर नहीं आ रहा।"
शालिनी ने हाथ बाँध कर उन दोनों को घूरते हुए जवाब दिया।
"अर... वो मजाक कर रहा है।"
शमा ने तिरछी निगाहों से मनदीप को घूरते हुए कहा और भौतिक ने अपना पैर जोर से उसके पैरों पर पटक दिया।
"आऊच!"
नतीजतन वो बुरी तरह चीख पडा़।
"ओये मनु पागल है क्या मरवायेगा हमें क्या?क्या हुआ क्या?"
शमा ने उसे फटकार लगाई।
"कुछ नहीं शायद कोई कीडा़ आ गया था पैरों पर।"
उसने एक पैर से दूसरा पैर सहलाते हुए माफी मांगने के अंदाज में कहा जबकि उसके चेहरे पर अभी भी दर्द का भाव था।
"तो प्लान क्या है?"
शालिनी ने भौतिक की तरफ देखते हुए पूछा जो उसके सवाल से बुरी तरह हैरान सबके चेहरे देखने लगा।
"अर... वो एक्चुअली.... "
"प्लान कुछ खास नहीं है अब हम यहाँ केक आर्डर करके तो बर्थ-डे नहीं मना सकतो काॅलेज के गेट के बाहर जायेंगे और थोड़ी दूर मौजूद सलमान भैया की दुकान पर चॉकलेट पेस्ट्री और कुल्हड़ वाली चाय के साथ तेरा बर्थ-डे मनायेंगे।"
शमा ने एक बार फिर भौतिक का बचाव करते हुए जवाब दिया।
"पर हम बाहर जायेंगे कैसे?"
बाकी चारों ने हैरानी के साथ उसके चेहरे को देखते हुए सवाल किया।
"अच्छा सवाल है!"
शमा ने रहस्यमय ढंग से मुस्कुराते हुए जवाब दिया।
और फिर इसके बाद पाँचों कैम्पस के मेनगेट की ओर बढ़ गये जबकि उनमें से किसी का भी ध्यान इस ओर नहीं गया कि वही काले जूते पहने हुए बिक्रम काफी देर से उनका पीछा कर रहा था हालांकि यह अंदाजा लगाना जरा मुश्किल था कि उसने उन पाँचों की कितनी बातें सुनीं थी पर उसके होंठों पर थिरकते कुटिल मुस्कान को देखकर इतना जरूर कहा जा सकता था कि इतना जरूर था कि आने वाले समय में उन पाँचों की मुश्किलें बढ़ने वाली थीं।
खैर यहाँ से बिक्रम मुड़कर वापस हाॅस्टल की ओर चल पड़ा जबकि वे पाँचों छुपते-छुपाते दबे पाँव काॅलेज के मेन गेट की ओर बढ़ रहे थे।
"कैमरे लगे हैं ध्यान से!"
शमा ने दबी आवाज में सबको चेतावनी दी और सब एकदम से जड़ हो गये।
"साॅरी मजाक कर रही थी!"
शमा ने हँसते हुए कहा।
"एक्चुअली हमारे हिटलर सर ने कई बार प्रिंसी से इस बारे में शिकायत की है पर प्रिंसी का कहना है कि बोर्ड आॅफ मेंबर्स इसके लिए तैयार नहीं हैं।"
शमा ने उनको जानकारी देते हुए बताया।
"मगर क्यों?"
पूछते वक्त भौतिक की आँखें आश्चर्य से सिकुड़ गईं।
"पता नहीं!"
कहने के साथ ही शमा आगे बढ़ गई।
आगे फिर खर्राटे मारते दोनों गार्ड्स के बीच में से निकलने में उन्हें कोई दिक्कत नहीं हुई।
"तो तुमने मुझे माफ कर दिया न?"
भौतिक ने शालिनी की आँखों में झांक कर पूछा जबकि बाकी तीनों उनसे तेज चल रहे थे।
"हुम्म!ओके पर एक बात सच-सच बताना तुम्हें नहीं पता था न कि आज मेरा बर्थ-डे था है न?"
शालिनी ने अपनी सपनीली मनकेदार आँखे भौतिक पर जमाते हुए पूछा और अब जाकर पहली बार भौतिक को एहसास हुआ कि शालिनी की आँखें थोड़ी सी हरी थीं।
"अर.... हाँ दरसल सारा प्लान शमा का था मुझे सच में नहीं पता था कि आज तुम्हारा बर्थ-डे था एक्चुअली मैं जिंदगी में पहली बार किसी की बर्थ-डे पार्टी में आया हूँ।"
"क्यों?ऐसा क्यों तुमने कभी अपना भी बर्थ-डे नहीं सेलिब्रेट किया क्या?"
शालिनी ने हैरान होकर सवाल किया।
"हुम्म्!एक्चुअली जब मैं पैदा हुआ था तो जब नर्स ने आॅपरेशन रूम से बाहर आकर सबको बताया कि उनके घर लड़का पैदा हुआ है तो मेरी दादी इतनी खुश हो गईं कि खुशी के मारे उन्हें हार्ट अटैक आ गया और वो चल बसीं बस तब से मेरे हर जन्मदिन पर मेरी दादी की बरसी मनायी जाती थी।"
भौतिक ने धीमे स्वर में बताया।
"ओह साॅरी सुन के बुरा लगा!"
"कोई बात नहीं ऐसे छोटे-मोटे हादसे हमारे यहाँ होते ही रहते हैं।"
कहने के साथ ही कंधे उचकाता हुआ भौतिक तेजी से चलकर शमा और बाकियों में जा मिला जबकि शालिनी पीछे से घूरती रही और जाने क्यों मगर उसकी आँखों में कुछ अजीब सा नजर आ रहा था।
खैर फिर शालिनी की बर्थ-डे पार्टी मनाने के बाद आखिरकार पाँचों वापस लौटने लगे पर कालेज के मेनगेट पर पहुँचते ही पाँचों की सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई क्योंकि सामने साक्षात् उनका खडूस प्रोफेसर हिटलर कोट पैंट पहने हुए मौजूद था।
बल्कि हिटलर के साथ हिस्ट्री की प्रोफेसर और गर्ल्स हाॅस्टल की वार्डन गीता मैम जिन्होंने मैरून रंग की नाइट गाऊन पहन रखी थी और दोनों वर्दीधारी गेटकीपर भी मौजूद थे।
एक ओर जहाँ हिटलर और गीता दोनों वार्डन्स के चेहरे पर असंतोष और गुस्सा झलक रहा था वहीं दोनों गेटकीपर मुँह फाड़कर उन्हें घूर रहे थे।
"तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई आधी रात को अपना बेड छोड़ कर इतनी दूर आने की!"
गीता मैम ने दोनों लड़कियों को बुरी तरह डपटकर पूछा और दोनों ने अपना सिर झुका लिया।
"अर.... "
शमा ने कुछ बोलने के लिए मुँह खोला पर हिटलर का गर्म तवे जैसा लाल चेहरा देखकर उसने यह विचार त्याग दिया और चुपचाप सिर झुकाकर खड़ी रही।
"लड़कियों हाॅस्टल के काॅमन रूम में पहुँचो इसी वक्त!"
गीता मैम ने गुर्राकर कहा और वे दोनों बिना कोई आवाज़ निकाले गर्ल्स हॉस्टल के गेट की ओर मुड़ गईं।
"सुबू बच्चों के साथ ज्यादा सख्ती मत बरतना!गुड नाइट।"
कहने के साथ ही गर्ल्स हॉस्टल की वार्डन गीता मैम हाॅस्टल की ओर बढ़ गई।
और करीब दस मिनट बाद वे तीनों हिटलर के आॅफिस रूम में मौजूद थे जहाँ उनके अलावा एक और शख्स बिक्रम मौजूद था और उसके होठों पर थिरकती मुस्कान ये बताने के लिए काफी थी कि सारा किया धरा उसी का था।
भौतिक ने नजरें ऊपर की और हल्के नारंगी प्रकाश से भरे कमरें में चारों तरफ देखा कोट स्टैंड पर टंगे कोट के अलावा कमरे में मौजूद हर एक चीज पर अच्छी खासी धूल जमी हुई थी।
अलमारियों की शेल्फों पर फाइलों और किताबों की भरमार थी।
"बिक्रम तुम्हारी जानकारी से हमें काफी मदद मिली लेकिन फिलहाल तुम अपने रूम में जाकर आराम कर सकते हो क्योंकि सुबह तुम्हें जल्दी से जल्दी ग्राउंड में पहुँचना है।"
"ओके सर!"
हालांकि बिक्रम अभी उन तीनों की हालत और खराब होते हुए देखने के मूड में था पर हिटलर की आज्ञा का सीधा विरोध करना उसे ठीक नहीं लगा इसीलिए एक आखिरी बार उन तीनों पर कहर ढा़ती निगाह डालने के बाद वो वापस मुड़ा और कमरे से बाहर निकल गया।
"इधर देखो सामने!"
हिटलर ने कड़क आवाज में कहा और तीनों की नजरें सीधी उसकी ओर जम गईं।
"ये तुम तीनों की पहली गलती है इसलिए इस बार मैं तुम्हें स्कूल से बाहर नहीं निकलवा रहा पर अगली बार अगर किसी ने ऐसी कोई हरकत की तो उसे बिना किसी बातचीत के सीधे कैम्पस से बाहर कर दिया जाएगा।"
हिटलर ने अपने डरावने अंदाज में कहा।
"बात समझ में आई?"
तीनों ने हल्के से सिर हिलाया।
"मुझे सुनाई नहीं दिया मैंनें पूछा कि क्या मेरी बात तुम तीनों को समझ में आई?"
"जी!"
तीनों ने एकसाथ सहमे हुए स्वर में जवाब दिया।
"जी क्या?जी सर बोलो!"
हिटलर ने उनके जवाब को ठीक किया।
"आगे से ध्यान रखना जब भी किसी टीचर के सामने खड़े हो तो सर लगाना मत भूलना।"
"जी सर!"
"अब तीनों अपने कमरे में कोई आवाज़ नहीं कोई बातचीत या डिस्कशन नहीं तुम तीनों को सजा दी जायेगी और वो क्या होगी ये कल सुबह पता चल जाएगा, अब जाओ!"
हिटलर का आदेश पाते ही तीनों मुड़कर अपने कमरे की ओर चल पड़े।
उनमें से किसी की भी एक दूसरे से नजरें मिलाने कि हिम्मत नहीं हो रही थी और आखिरकार तीनों अपने-अपने बिस्तर पर पहुंच गये।
"हालांकि भौतिक जानता था कि वो दोनों भी सो नहीं रहे थे पर फिर भी उसने कुछ कहने के बजाए सोने का नाटक करना ज्यादा ठीक समझा।
"तो अब मैं तुम्हारी सजा तय करने वाला हूँ.... "
काॅलेज स्टाफ और सारे स्टूडेंट्स के बीच मौजूद हिटलर ने उस पर रौब झाड़ते हुए कहा जबकि भौतिक का मन जबर्दस्त गुस्से की लहर उठ रही थी।वो हिटलर का गला दबाकर उसकी हत्या करना चाहता था।
"और वो सजा ये है कि तुम हम सबके जूते साफ करोगे अपनी रुमाल से।"
हिटलर ने बुरी तरह दाँत दिखाकर हँसते हुए कहा जोकि भौतिक को बहुत अजीब सा लग रहा था क्योंकि उसने कभी हिटलर को इस तरह हँसते हुए नहीं देखा था।
"पहले मेरे!"
कहने के साथ ही बिक्रम ने अपने गंदे काले जूतों वाला पैर उसकी ओर बढ़ा दिया और सब के सब हँसने लगे।
और अचानक बिक्रम का पैर बडा़ होने लगा दो फुट.... बारह फुट.... और उसके पैरों तले दबे जा रहे भौतिक की साँसें फूलने लगी तभी अचानक उसकी नींद खुल गई और आस-पास हिटलर और बिक्रम के क्रूर चेहरों के बजाए मनदीप और जतिन के हैरान चेहरे देखकर उसे थोड़ी राहत मिली।
यह महज एक सपना था, बुरा सपना!
उन्हें सजा मिलनी तो अभी बाकी थी।
"गुड मॉर्निंग!"
उसने बाकी दोनों से मुस्कुराते हुए कहा पर उनके बेरुखे चेहरे देखकर अचानक उसे बीते रात की पूरी घटना याद आ गई और एक बार फिर वो शर्मिंदगी महसूस करने लगा क्योंकि यह उसकी गलती थी जिसके वजह से वे दोनों पकड़े गए।
खैर इसके बाद हर सुबह की तरह आज भी वे तीनों एक साथ ग्राउंड की ओर चल पड़े फर्क बस इतना था कि आज उनके बीच काफी खामोशी थी बहरहाल इससे उन्हें इतनी दिक्कत नहीं हुई जितनी इस बात से कि आता-जाता हर स्टूडेंट उन्हें बुरी तरह घूर रहा था।
"शायद बिक्रम ने पूरे हाॅस्टल में बात फैला दी है?"
जतिन ने बुरी तरह मुँह बनाते हुए कहा जैसे उसने कोई कड़वी दवा पी ली हो बहरहाल बिक्रम का नाम सुनकर भौतिक के माथे की नसें बुरी तरह फड़कने लगीं।
खैर ऐसे ही बातें करते हुए तीनों अपनी-अपनी क्लासेज की ओर चल पड़े।
"तुम लोगों को भी सजा मिली?"
क्लासेज खत्म होने के बाद दोपहर को कैंटीन में बैठे जतिन ने शमा से पूछा।
"अर..... नहीं!वार्डन ने वार्निंग देकर छोड़ दिया।"
शमा ने गंभीर स्वर में जवाब दिया।
"माफ करना दोस्तों मेरी वजह से तुम लोगों को इतनी प्रॉब्लम्स हो रही हैं।"
शालिनी ने झिझकते हुए कहा।
"अर.. देखो ये तुम्हारी गलती नहीं है ये तो सबकुछ उस गधे के बच्चे बिक्रम की मेहरबानी से हुआ है।"
भौतिक ने उसे समझाते हुए कहा बहरहाल वो दोनों शायद मन ही मन खुद को दोष दिये जा रही थीं।
"अर... हिटलर... ने क्या कहा?"
शमा ने डरते सहमते हुए सवाल किया।
"कुछ नहीं बस अज से एक महीने तक भौतिक को नाइट शिफ्ट में कैम्पस के लिए वॉचमैन की ड्यूटी करनी होगी और मुझे और जतिन को बस कॉलेज का स्टोर रूम साफ करना है!"
मनदीप ने चिढ़ते हुए जवाब दिया और एक बार फिर दोनों लड़कियाँ झेंप गईं।
"मुझे क्लास जाना है मैं निकलता हूँ!"
कहने के साथ ही भौतिक उठकर कैम्पस की ओर चल पड़ा और जतिन भी उसके पीछे हो लिया जबकि बाकी तीनों वहीं बैठकर उनकी पीठ को घूरते रहे क्योंकि उनकी सारी क्लासें खत्म हो चुकी थीं।
"शायद वो परेशान है!"
शालिनी ने सहमे हुए अंदाज में कहा।
"हाँ क्योंकि वो इस सबके लिए खुद को दोष दे रहा है और उसे लगता है कि उसी के वजह से मुझे और जतिन को भी सजा मिली।"
मनदीप ने आह भरते हुए कहा।
"पर उसकी गलती नहीं है!"
शमा ने बेबस होकर जवाब दिया।
"हाँ जानता हूँ।"
कहने के साथ ही मनदीप भी वहाँ से उठकर चला गया।
वहीं दूसरी तरफ भौतिक क्लास में जाना है बोल कर हाॅस्टल की ओर चल पड़ा और रास्ते में उसका सामना उसी इंसान से हो गया जिससे इस वक्त देखना उसे बिल्कुल भी पसंद नहीं आने वाला था।
"दोस्तों मैं सोंच रहा हूँ आज रात काॅलेज से निकल कर क्यों न हम कहीं पार्टी करने जाये।"
अपने कुछ दोस्तों के साथ सामने से आ रहे बिक्रम ने उनका मजाक उड़ाते हुए कहा और फौरन भौतिक उसके गर्दन की ओर लपक पड़ा पर इससे पहले वो उसे कुछ करता या बिक्रम और उसके दोस्त मिलकर उसका कचूमर बनाते जतिन ने भौतिक को पकड़ लिया।
"रोक मत आने दे चिलगोजे इसकी सारी गर्मी अभी और यही दूर किये देता हूँ।"
बिक्रम ने अपना साँड जैसा शरीर लहराते हुए कहा।
"अच्छा और मैं भी देखना चाहूँगा कि तेरे जैसा दो पैरों पर चलने वाला गोरिल्ला मेरा क्या बिगाड़ सकता है!"
भौतिक ने खुद को जतिन से आजाद करते हुए व्यंग्य से कहा जबकि गुस्से में नथुने फुलाता हुआ गोरिल्लाकाय बिक्रम उस पर झपट पडा़।
"क्या चल रहा है यहाँ?"
इससे पहले कि दोनों आपस में गुत्थमगुत्था होते प्रोफेसर हिटलर की रौबदार आवाज उनके कानों में पडी़ और दोनों अलग-अलग हो गये।
"कुछ नहीं सर मैं इन बच्चों को कुश्ती के कुछ दाँव सिखा रहा था।"
बिक्रम ने रौब झाड़ते हुए कहा।
"अच्छा!"
प्रोफेसर हिटलर ने हैरानी जताते हुए कहा।
"मुझे तो लगता है कि अभी तुम्हें ही बहुत कुछ सीखने की जरूरत है बच्चे कबड्डी ट्रायल्स नजदीक आ रहे हैं।"
"अर... जी सर!"
बिक्रम ने हिकारत भरे स्वर में कहा और वहाँ से जाने लगा।
"तुझे तो देख लूँगा।"
उसने अपने दोस्तों के साथ भौतिक के पास से गुजरते हुए कहा।
"क्यों नहीं रात बारह बजे ग्राउंड में हिम्मत है तो आ जाना!"
भौतिक ने भी धीरे से जवाब दिया ताकि सिर्फ उसे ही सुनाई दे और इसी के साथ एक बार फिर उस पर कहर ढा़ती निगाह डालने के बाद से बिक्रम और उसके दोस्त वहाँ से खिसक गये।
"और तुम लोग डिनर के पंद्रह मिनट बाद से अपनी-अपनी सजाएं भुगतने के लिए तैयार रहोगे।"
हिटलर ने तीखी सी आवाज़ में कहा।
"पर सर इसमें मेरे दोस्तों की कोई गलती नहीं है आप उन्हें सजा नहीं दे सकते।"
भौतिक ने एक बार फिर वही बात दोहराई।
"मैं क्या कर सकता हूँ और क्या नहीं ये तुम नहीं मैं निर्धारित करूँगा।नाऊ गो टू योर चेंबर।"
कहने के साथ ही हिटलर तेजी से मुड़कर कैम्पस की ओर बढ़ गया।
"खूँसट कहीं का!"
भौतिक ने हिकारत भरे शब्दों में कहा और जतिन को साथ लेकर वापस हाॅस्टल की ओर बढ़ गया।
"तुम सचमुच उससे झगड़ा करने वाले हो?"
जतिन ने घबराहट भरे स्वर में भौतिक से सवाल किया।
"नहीं बिल्कुल नहीं बल्कि मैं तो उसके लिए कुछ और इंतजाम करने वाला हूँ।"
भौतिक ने कुछ सोंचते हुए जवाब दिया।
"कहीं तुम फिर से तो कुछ ऐसा नहीं करने जा रहे हो जिससे हम सब मुसीबत में आ जाये?"
जतिन ने घबराहट भरे स्वर में सवाल किया।
"बिल्कुल भी नहीं दोस्त बल्कि मुसीबत में तो अब वो गैंडा बिक्रम पड़ने वाला है माफ करना दोस्त मुझे ढे़र सारा काम है।"
भौतिक ने रहस्यमय ढंग से जवाब दिया और इससे पहले कि वह कुछ और पूछता भौतिक कमरे से बाहर निकल गया।
"तू अभी तक यहीं है चल हमें आज की सजा पूरी करनी है और ये कहाँ गया?"
कमरे में घुसते हुए मनदीप ने भौतिक के बिस्तर की ओर इशारा करते हुए पूछा।
"पता नहीं वो उस बिक्रम के लिए कोई मुश्किल खड़ी करने गया है या अपने लिए।"
जतिन ने गोलमोल जवाब दिया जिसका मतलब उसे बिल्कुल भी समझ नहीं आया और आखिरकार वो दोनों भी अपनी-अपनी सजा भुगतने के लिए निकल पड़े।
अगली सुबह फिर वही रुटीन दोहराई गई हिटलर के फायर अलार्म को सुनकर भौतिक की नींद खुल गई और उसने बिस्तर से उतरकर बाकियों को जगाया।
"अब उठो भी लग रहा है तुम दोनों ने कल काफी मस्ती की।"
भौतिक ने दोनों को चिढा़ते हुए कहा।
"हाँ क्यों नहीं पुरानी टूटी फूटी कुर्सियां और कबाड़ का सामान साफ करने से ज्यादा मजेदार काम और क्या हो सकता है!"
मनदीप ने मुँह बिचकाते हुए जवाब दिया।
"तुम सुनाओ दोस्त तुम्हारी रात कैसी गई?"
जतिन नें जम्हाई लेते हुए भौतिक से सवाल किया।
"अभी थोड़ी देर में पता चल ही जायेगा फिलहाल बाहर चलो।"
कहने के साथ ही अपना ब्रश और तौलिया लेकर भौतिक बाहर निकल गया।
"कोई सजा पाकर इतना खुश कैसे हो सकता है?"
दोनों ने एक दूसरे का मुँह ताकते हुए सवाल किया बहरहाल जवाब उन्हें जल्दी ही मिल गया।
रोजमर्रा के कामों से फुर्सत पाकर आखिर जब तीनों बाकी स्टूडेंट्स के पीछे-पीछे ग्राउंड में पहुंचे तो तो उन्हें वहां इकट्ठा हुई भीड़ देखकर उन्हें काफी हैरानी हुई।
"इन लोगों को आज हो क्या गया है आज लाइन बनाकर खडे़ होने के बजाय सब घेरा बनाकर क्यों खड़े हैं कहीं हिटलर जमीन पर लेटकर नागिन डांस तो नहीं कर रहा?"
मनदीप ने स्टूडेंट्स का अजीब बर्ताव देखते हुए खुद से सवाल किया बहरहाल इसका कोई भी जवाब उसके पास नहीं था।
"हटो जरा हमें भी देखने दो!"
भीड़ में घुसकर उस भीड़ को चीरते हुए मनदीप आगे बढा़ ताकि अच्छे से देख सके कि आगे क्या हो रहा था और उसके ठीक पीछे जतिन भी था।
बहरहाल भीड़ के आगे पहुँचते ही उसकी आँखें भी बाकियों की तरह खुली की खुली रह गई और जतिन का चेहरा तो वाकई देखने लायक था।
असल में सामने बिक्रम एक पेड़ पर रस्सी से बँधा हुआ उल्टा लटक रहा था और उसका चेहरा बुरी तरह से पीला पड़ चुका था।
"हटो क्या हो रहा है यहाँ!"
अचानक भीड़ में हिटलर की रौबदार आवाज सुनाई दी और भीड़ ने एक ओर हटकर फौरन उन्हें रास्ता दिया बहरहाल आगे का नजारा देखकर उनका भी चेहरा फख्त पीला पड़ गया।
"सभी स्टूडेंट्स अपने रूम में जायेंगे अभी इसी वक्त और मिस्टर भौतिक तुम आधे घंटे बाद मेरे आॅफिस में आओगे।"
हिटलर भी आखिरकार हिटलर था और इसीलिए सभी स्टूडेंट्स ने उसके हुक्म का पालन किया और दो-तीन को छोड़कर हर कोई वापस हाॅस्टल की ओर चल पड़ा बहरहाल आज काफी हलचल थी उन लोगों के बीच।
खैर रुकने वाले स्टूडेंट्स बिक्रम के दोस्त थे जिन्हें खुद हिटलर ने रुकने के लिए कहा था ताकि बिक्रम को पेड़ से उतारा जा सके।
"प्लीज़ कह दो कि ये तुमने नहीं किया।"
मनदीप और जतिन ने सामने की बिस्तर पर बैठे भौतिक से कहा।
"बेशक ये मेरा ही काम है और अगर इसके लिए हिटलर मुझे दोबारा सजा देगा तो मैं तैयार हूँ।"
भौतिक ने इतराते हुए जवाब दिया।
"पर कैसे?"
दोनों ने एकसाथ हैरान होकर सवाल किया।
"अर... मैंनें बस जाल बिछाया था जैसा कि मेरे गाँव वाले अक्सर बिछाते हैं जंगली जानवरों से अपने खेत बचाने के लिए।"
भौतिक ने सीधे-सीधे जवाब दे दिया और बाकी दोनों बस उसका चेहरा देखते रह गये।
"अब चलो मुझे हिटलर के चिड़ियाघर में जाना है जिसे वो आॅफिस बोलते हैं।"
कहने के साथ ही भौतिक उठकर वहाँ से बाहर निकल गया और बाकी दोनों उसे जाते हुए देखने लगे।
"इसने तो बिक्रम से ही पंगा ले लिया और मुझे लगता है कि अब बिक्रम इसे नहीं छोडे़गा।"
मनदीप ने घबराहट भरे स्वर में कहा।
"बिक्रम से पंगा!"
जतिन ने दोहराया और तो और उसके तो हाथ-पैर अभी तक काँप रहे थे... To Be Continue In Next Chapter

                                     Written By
                        Manish Pandey ’Rudra'

©manish/pandey/17-05-18