Thursday, May 10, 2018

Hitler

                           हिटलर

                       अध्याय - दो
                  एक जोड़ी काले जूते

शमा और जतिन के साथ सीढ़ियों की ओर बढ़ते हुए भौतिक को कॉलेज का माहौल काफी खुशनुमा लग रहा था और जैसा कि अक्सर कॉलेज में देखने को मिलता है कई लड़के-लड़कियाँ सीढ़ियों पर चलते हुए एक दूसरे से बातें कर रहे थे तो वहीं दूसरी तरफ एक कोने में खड़े कुछ स्टाइलिश मगर आवारा से दिखते लड़के आपस में इस बात पर शर्त लगा रहे थे कि वहीं थोड़ी दूर एक दूसरे कोने में खड़ी लड़कियों में से कौन उनकी तरफ देख रही थी।
क्लासों में भी हमेशा की तरह शोरगुल हो रहा था कुल मिलाकर भौतिक के हिसाब से माहौल काफी रोमांचकारी था उसे काफी समय से कॉलेज जाने और कॉलेज लाइफ जीने का इंतजार था।
बहरहाल अपने चारों ओर की चहल-पहल और शोर-शराबे को देखते हुए वह अपनी क्लास में चला गया जहाँ इससे भी ज्यादा हुड़दंग हो रहा था।
सभी नये लड़के-लड़कियाँ एक दूसरे को कौतूहल भरे नजरों से देख रहे थे और कई लड़के तो लड़कियों को लाइन मारने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे।
"हाय मेरा नाम राज है!"
एक बिखरे बालों वाले लड़के ने अपने सामने खड़ी लड़की से कहा और उसकी ओर हाथ मिलाने के लिए अपना हाथ बढ़ा दिया पर वो लड़की थोड़ी डरी थोड़ी सहमी सीं संकोच में अपने कंधे पर लटकाए बैग को मजबूती से पकड़े हुए अपनी जगह पर आगे-पीछे झूल रही थी।
हालांकि भौतिक को उसका चेहरा नहीं दिख रहा था पर न जाने क्यों उसके लिए भौतिक के मन में बेहद करुणा का भाव उमड़ रहा था शायद इसलिए क्योंकि वो भी कल तक उस लड़की की तरह उसी हालात से गुजर रहा था जिस हालत में वो लड़की थी।
"ओये लंगूर की दुम नाक बह रही है तेरी जाके पहले वो साफ कर!"
शमा ने बेधड़क उस लड़की और उस लड़के के बीच में जाते हुए बोला और फौरन ही वो लड़का झेंप कर वहाँ से निकल गया।
और अपने लिए किसी को आवाज उठाते देख उस लड़की की हिम्मत बढ़ गई सो उसने पलट कर शमा की ओर देखा और ठीक उसी वक्त भौतिक की नजर भी उस लड़की के चेहरे पर पड़ी।
अचानक भौतिक के भीतर एक अजीब सी झुरझुरी उठी और भौतिक की नजरें बस उस लड़की के चेहरे पर चिपक गईं।
अंडाकार चेहरा, गुलाब की पंखुड़ियों जैसे उसके होंठ  और काली मनकेदार आँखों वाली वो लड़की भौतिक के जेहन पर कब्जा कर रही थी।
"तुम्हारा नाम क्या है?"
शमा ने उस लड़की को ध्यान से देखते हुए सवाल किया।
"श... शालिनी जैन!"
उस लड़की ने दबी हुई जुबां से नाम बताया।
"नाइस नेम!बाई द वे मैं शमा हूँ और ये मेरा फ्रेंड भौतिक है और उसका फ्रेंड है पुतिन।"
शमा ने भौतिक और जतिन का परिचय देते हुए बताया।
"अर.. जतिन।"
जतिन ने धीरे से कहा पर शमा ने उस पर ध्यान नहीं दिया।
"तुम भी हॉस्टल में हो न?"
अचानक जतिन ने शालिनी से पूछा और बेहद तेजी से भौतिक औरशमा की नजरें उसकी ओर घूम गईं।
"अर.. कल गर्ल्स हॉस्टल की खिड़की पर मैंनें शायद इन्हें देखा था बस एक झलक।"
जतिन ने झेंपते हुए बताया।
"हाँ वो मैं ही थी।"
शालिनी ने धीमी आवाज में जवाब दिया।
"सही है फिर चलो पीछे की बेंच पकड़ लेते हैं वरना आगे बैठना पडे़गा।"
कहने के साथ शमा पीछे की एक खाली बेंच की ओर बढ़ गई और उसके साथ ही बाकी सब भी।
"बहुत मजा आने वाला है क्योंकि ये क्लास बबली सर अटेंड करेंगे।"
शमा ने चहकते हुए कहा जबकि बाकी तीनों हैरान होकर उसे देखने लगे।
"बबली सर?"
अचानक पूरी क्लास खामोश हो गई।
"लड़कों और लड़कियों फौरन सब अपनी-अपनी जगह पर बैठ जाओ आज आप सबका पहला क्लास है और मैं नहीं चाहता कि मुझे आपमें से किसी को भी क्लास से बाहर निकालना पड़े।"
क्लास में घुसते ही अपने रोमानी अंदाज में बबली सर ने सबको चेतावनी दी जबकि उनके आते ही क्लास के सारे लड़के-लड़कियां एक साथ खड़े हो गए और फिर उनका इशारा पाते ही बैठ भी गये।
चूंकि क्लासरूम काफी बड़ा था और सैकड़ों बेंचें लगी हुई थीं पर बेंचें सीढी़दार ढंग से लगी थीं जिससे कि आगे बैठे स्टूडेंट्स की तरह पीछे बैठे स्टूडेंट्स को भी सामने मौजूद टीचर और ग्रीनबोर्ड साफ-साफ दिखाई दे।
पीछे बैठे भौतिक ने बबली सर पर नजर डाली और उसने अंदाज़ा लगाया कि सामने मौजूद दुबला मगर लम्बे कद का इकहरे बदन वाला आदमी काफी हँसमुख और सुलझा हुआ बेहद समझदार इंसान लग रहा था।
"लड़की दायें हाथ के अँगूठे में लगाना भूल गई।"
अचानक बबली सर ने कुछ दूरी पर बैठी एक लड़की को टोका और सबकी निगाहें उसी ओर मुड़ गईं।
इसके साथ ही क्लास में नेलपालिश लगा रही वह लड़की एकदम से शर्मिंदा हो गई।
"ओये हनी सिंह उसे घूरने के बजाए उसके पास आके बैठ जा।"
अचानक टोके जाने की वजह से वह लड़का झेंप गया जो कुछ देर पहले शालिनी के सामने खड़ा हाथ मिलाने के लिए परेशान था।
"सो बाॅयज एंड गर्ल्स अगर आप सबका नैन-मटक्का और मेकअप वगैरह हो गया हो तो आज का लेक्चर स्टार्ट करें?"
बबली सर ने अपने रोमानी अंदाज में सवाल किया और ग्रीनबोर्ड की ओर मुड़ गए।
"रुकिए सर थोड़ा सा आईब्रो ठीक कर लूँ।"
अचानक शमा ने बीच में टोक दिया और भौतिक की तरह कई और लड़क-लड़कियाँ भी उसे घूरने लगे।
"औह तो शमा जी आप भी यहीं मौजूद हैं, बेटा कभी-कभार अपनी क्लास भी अटेंड कर लिया करो।"
बबली सर ने सबसे पीछे बैठी शमा को घूरते हुए कहा।
"जी सर!"
शमा ने पलकें झपकाते हुए कहा और उसे ऐसा करते देख भौतिक की हँसी छूट गई।
"और आप हैं मिस्टर... "
"अर... भौतिक शर्मा!सर!"
"ओह!अब कोई जरा सी भी आवाज नहीं करेगा मैं लेक्चर शुरू करता हूँ।"
कहने के साथ ही बबली सर दोबारा ग्रीनबोर्ड की ओर मुड़ गए।
"मे आई कम इन सर?"
इससे पहले कि बबली सर अपना लेक्चर स्टार्ट करते एक लड़का दरवाजे पर आ गया और उसकी आवाज सुनकर बबली सर उसकी ओर मुड़ गये।
"अभी तक कहाँ थे?"
"क्लास खोज रहा था सर इत्ता बडा़ कॉलेज है कि मुझे लगा मैं तो यहाँ खो ही जाउँगा।"
"अच्छा अब जल्दी जाकर किसी बेंच पर बैठ जाओ।"
"ओके सर लेकिन बबली मैम का क्लास आप क्यों ले रहे हैं।"
बिना अपनी जगह से हिले उस लड़के ने सवाल किया और उसका सवाल सुनकर फौरन बबली सर के कान गुलाबी हो गये।
"गधे की दुम के बाल वो बबली मैं ही हूँ अब चुपचाप जाकर बैठ जाओ।"
बबली सर ने गुस्से में भभकते हुए जवाब दिया और एक बार फिर ग्रीनबोर्ड की ओर मुड़ गये।
खैर इस बार लेक्चर के बीच में किसी ने बोलने की हिम्मत नहीं की लेकिन पाँच मिनट बाद ही बेल बज गई और बबली सर का लेक्चर अधूरा रह गया।
"तो कुछ नालायकों की वजह से जो लेक्चर अधूरा रह गया वो कल पूरा करते हैं।"
कहने के साथ ही बबली सर गुस्से में पैर पटकते हुए क्लास से बाहर निकल गये और पीछे-पीछे बाकी लड़के लड़कियाँ भी निकलने लगे।
"इनका लेक्चर कभी टाइम पर पूरा हुआ है?"
भौतिक ने अचानक शमा से सवाल किया।
"सच कहूँ तो जबसे मैं यहाँ काॅलेज में आई हूँ आज दूसरी बार कोई क्लास अटेंड किया है।"
शमा नें आँखें मटकाते हूए जवाब दिया और चारों एक साथ हँस पड़े।
"चलो कैंटीन में चलो मैं तुम सबको अपनी गैंग से मिलवाती हूँ।"
कहने के साथ ही चहकती हुई शमा वापस सीढ़ियों की ओर चल पड़ी और बाकी तीनों भी उसके पीछे हो लिये।
खैर थोड़ी देर बाद वे चारों काॅलेज के कैंटीन में बैठे आस-पास के माहौल को अपने जेहन में कैद कर रहे थे।
"तो शालिनी तुम बताओ इस काॅलेज में एडमिशन क्यों लिया?"
बर्गर का एक टुकड़ा खाते हुए शमा ने उससे पूछा।
"अर... मेरे पापा बहुत स्ट्रिक्ट हैं उन्हें काॅलेज वगैरह नहीं पसंद पर मैं आगे पढ़ना चाहती थी इसलिए मैंनें मम्मी से जिद की और मम्मी ने पापा को मना लिया और पापा ने सबसे पास के काॅलेज में एडमिशन करवा दिया।"
शालिनी नें बताया।
"और तू बता चम्पकलाल तू यहाँ कैसे पहुँच गया?"
शालिनी के बाद शमा ने जतिन से सवाल किया।
"पापा चाहते थे कि म... मैं किसी ऐसे काॅलेज में पढूँ जहाँ मेरी अच्छी पिटाई हो इसलिए यहाँ भेंज दिया वो कहते हैं कि हिटलर उनका दोस्त है।"
"क्या?"
जतिन की बात सुनकर शमा चौंक गई जबकि बाकी तीनों उसे घूरने लगे।
"भाई जतिन तेरे तो लग गये।"
"क्यों?"
भौतिक ने सवाल किया।
"क्योंकि हिटलर अब इसका खास ख्याल रखेगा और हिटलर जिसका ख्याल रखने लगा उसका तो ऊपरवाला ही मालिक है।"
कहने के साथ ही शमा खिलखिलाकर हँस पड़ी और जतिन की पहले से रोतली सूरत और भी रोतली लगने लगी।
"हाय शमा!"
चारों बैठे आपस में बातें कर रहे थे कि तभी तीन लड़के और भी आ गये।
"ओ हाय चिरकुट क्या हाल है?"
शमा ने अपने बिंदास वाले अंदाज में उनका स्वागत किया।
"भौतिक मीट माई ग्रुप मेंबर्स अरुन, केसर और अनंत  तीनों मेरे ही इयर में हैं और अपने-अपने जोन में ब्रिलिएंट भी।" 
"हाय!"
सभी एक-दूसरे को सामान्य परिचय देते हुए आपस में बातें करते हैं ताकि एक-दूसरे को अच्छी तरह से जान सकें।
"ओके मेरा क्लास है मैं निकलता हूँ।"
कहने के साथ ही भौतिक अपने स्थान से उठकर जाने लगा तभी शमा ने उसे रोक दिया।
"रुको भौतिक मैं भी चलती हूँ वै कौन सी क्लास है?"
अपनी जगह पर से उठते हुए शमा ने पूछा।
"मैथ्स की!"
भौतिक ने सामान्य अंदाज में गर्दन लहराते हुए जवाब दिया और शमा जितनी तेजी से उठ रही थी उतनी ही तेजी से वापस बैठ गयी।
"क्या हुआ?"
भौतिक ने उसकी इस हरकत पर हैरानी जताते हुए पूछा।
"अरे तुम्हें पता भी है मैथ्स की क्लास कौन लेता है हिटलर!"
शमा ने दाँत भीँचकर जवाब दिया।
"ओह फिर ठीक है तुमलोग बैठो हम जाते हैं चल जतिन।"
कहने के साथ ही भौतिक पलटकर वापस क्लासों की ओर चल पड़ा और सीढ़ियों पर चढ़ते हुए उसने देखा कि जतिन के साथ-साथ शालिनी भी उसके पीछे-पीछे आ रही थी।
"तुम्हारा भी क्लास है क्या?"
भौतिक ने उससे पूछा और उसने धीरे से सिर हिला दिया।खैर अभी तीनों कुछ ही सीढ़ियाँ चढे़ होंगे कि पीछे से मनदीप भागता हुआ आया।
"भौतिक.... भौतिक रुक!"
मनदीप की आवाज़ सुनकर तीनों पलटे हालांकि शालिनी उसे नहीं जानती थी पर फिर भी उसे गौर से देखने लगी और एक पल के लिए मनदीप भी उसे घूरने लगा।
"क्या हुआ?"
भौतिक ने उससे दूसरी बार सवाल किया।
"अँ.... अर... हाँ तू जल्दी चल बाहर तेरे पापा आये हैं शायद और उन्होंने कैम्पस के गेट पर आफत मचा रखी है।"
मनदीप सबकुछ एक साँस में जल्दी-जल्दी बोल गया और बुरी तरह हाँफने लगा जबकि भौतिक को पूरी बात समझने में कुछ मिनट लग गये।
"क्या?"
भौतिक ने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा।
"हाँ!अब चल जल्दी।"
मनदीप ने कहा और तेजी से वापस जाने के लिए मुड़ गया।
"साॅरी मुझे जाना होगा तो ऐसा करते  हैं तुम लोग क्लास के लिए निकलो मैं पहुँचता हूँ।"
वहीं भौतिक ने पलट कर जतिन और शालिनी की ओर लाचारी भरी निगाह से देखते हुए कहा। 
"ह्म्म्म्!कोई बात नहीं।"
कहने के साथ ही जतिन और शालिनी दोनों अपने क्लास की ओर बढ़ गये जबकि भौतिक मनदीप के पीछे कैम्पस के मेनगेट की ओर लपक पड़ा।
काफी देर बाद जब हाँफता हुआ भौतिक वापस सीढियाँ चढ़ रहा था उस समय वह अकेला और काफी थका हुआ लग रहा था जैसे हमला करने वाले नागफनी से भिड़कर आया हो।बहरहाल अपने क्लासरूम की ओर बढ़ते हुए उसे आने वाले तूफान की जरा भी खबर नहीं थी।
क्लासरूम के दरवाजे पर पहुंच कर उसके कदम अपने आप ठिठक कर रुक गए क्योंकि अंदर हिटलर की क्लास चल रही थी और पूरे क्लास मेंं सिर्फ ग्रीनबोर्ड पर चाकॅ रगड़ने की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
इसी के साथ उड़ती निगाह डालने के बाद उसने पाया कि पहली ही क्लास में करीब चार लड़के अपने-अपने बेंच पर हाथ हवा में ऊपर उठाकर खड़े हुए थे।ध्यान से देखने पर पता चला कि उनमें से एक जतिन भी था और उसे ऐसी हालत में देखकर भौतिक की हँसी छूट गयी।
भौतिक ने यही अंदाज़ा लगाया कि शायद उन सबको किसी बात के लिए सजा दी गई होगी।बहरहाल उसने इन पर से ध्यान हटाते हुए क्लास में घुसने के लिए परमीशन माँगने की कोशिश की।
"मे आई कम इन सर?"
अचानक खामोशी को चीरती हुई भौतिक की आवाज़ सुनकर क्लास में मौजूद हर स्टूडेंट का सिर ग्रीनबोर्ड की ओर मुड़ गया जतिन और हिटलर का भी बहरहाल हिटलर ने उसपर कहर ढा़ती निगाह डालने के बाद वापस ग्रीनबोर्ड पर कोई मैथमेटिक इक्वेशन लिखना जारी रखा और इसी के साथ क्लास में मौजूद हर स्टूडेंट का सिर ग्रीनबोर्ड की ओर मुड़ गया सिवाय जतिन के जिसके चेहरे पर अजीब सा दर्द का भाव था।
खैर हिटलर के द्वारा इतनी बुरी तरह से नजरअंदाज किये जाने के बाद भौतिक का चेहरा लाल पड़ने लगा और इस बात से हिटलर के प्रति उसकी चिढ़ और उसका गुस्सा कई गुना बढ़ गया।
"क्या मैं अंदर आ जाऊँ सर!"
इस बार उसने दोगुनी तेज आवाज़ में कहा और फौरन पूरी क्लास उसे मुँह फाड़कर घूरने लगी जिसके बाद उसे अपने कानों के पीछे गर्मी महसूस होने लगी।
हालांकि इस बार भी हिटलर ने कोई जवाब नहीं दिया  बल्कि बेहद तीखी निगाहों से उसे घूरने लगे और इस वक्त उनका चेहरा बुरी तरह लाल हो गया था और उनकी मांसपेशियां बुरी तरह फूल और पिचक रही थीं ये बात भौतिक भी महसूस कर रहा था।
खैर इन सबका नतीजा ये हुआ कि अब एक बार फिर हिटलर ग्रीनबोर्ड पर ढे़र सारे मैथमेटिकल इक्वेशन लिख रहा था जबकि भौतिक भी जतिन के बगल बेंच पर दोनों हाथों को हवा में लहराये हुए खड़ा था और मन ही मन हिटलर को बहुत बुरा-भला कह रहा था।
खैर बीस मिनट बाद क्लास खत्म हो गई और बेल बजते ही ग्रीनबोर्ड पर लिखना बंद करके हिटलर वापस पलटा कुछ पलों के लिए उसने भौतिक को बुरी तरह घूरा और भौतिक ने भी वापस उन्हें घूरना जारी रखा इसके बाद मुड़कर हिटलर क्लास से निकल गया।
"वो तुम्हें पसंद नहीं करते है न!"
साथ में चलते हुए शालिनी ने भौतिक से पूछा और जतिन भी उसका मुँह ताकने लगा जबकी उसका पूरा बदन अकड़ गया था।
"हाँ तो मैं उसे कौन सा पसंद करता हूँ बल्कि मैं तो ये सोंच रहा हूँ कि उसके जैसा खड़ूस आदमी यहाँ का प्रोफेसर कैसे बन गया।"
भौतिक ने हिटलर का मजाक उडा़ते हुए कहा हालांकि उसके भी कंधे दुख रहे थे।
"हाहाहा!वेरी फनी पर शायद तुमने ध्यान नहीं दिया कि वो कितना अच्छा पढ़ा रहे थे।"
शालिनी ने चिढ़ते हुए कहा।
"ओह हाँ माफ करना अगर तुम्हारी तरह मैं भी आराम से बेंच पर बैठा होता और मुझे उसके लिए गालियाँ बकने से फुर्सत मिल जाती तो मैं जरूर ध्यान देता कि उसके जैसा ढक्कन आदमी ग्रीनबोर्ड पर क्या लिख रहा था।"
भौतिक ने व्यंग्य कसते हुए जवाब दिया।
"हाँ अगर तुम सही समय पर क्लास में मौजूद होते तो तुम भी मेरी तरह आराम से बेंच पर बैठे रहते और शायद तब तुम्हें दिखता कि उन्हें अपने सब्जेक्ट का कितना डीप नाॅलेज था।"
शालिनी ने रोष भरे शब्दों में जवाब दिया।
"हाँ क्योंकि बाहर मेरे पापा आये हुए थे कम से कम मेरे पापा को मेरी परवाह तो है।"
भौतिक ने गुस्से में आकर कुछ ज्यादा ही बोल दिया और उसको जवाब देने के बजाए शालिनी कुछ पलोऔ तक उसे गुस्से से घूरती रही और इसके बाद आँखों में आँसू लिए हुए वहाँ से निकल गई।
"तुम्हें इतना ज्यादा नहीं बोलना चाहिए था।"
जतिन ने डरते-डरते उसे समझाने की कोशिश की जबकि भौतिक अपने व्यवहार पर बुरी तरह हैरान और शर्मिंदा था।
"वैसे तुम्हें आने में इतनी देर क्यों हो गई थी और तुम्हारे पापा किसलिए आये थे?"
जतिन ने उससे सवाल किया।
"हाॅस्टल चलो रास्ते में सब बताता हूँ।"
कहने के साथ ही भौतिक सीढ़ियों की ओर चल पड़ा।
"हाँ चलते हैं वैसे भी मैं तुम्हारे ही रूम में शिफ्ट हो गया हूँ।"
"हाँ मनदीप ने बताया।"
"तुम इससे खुश नहीं हो!"
"अर.. नहीं देखो मैं खुश हूँ पर मैं इस वक्त नाच तो नहीं सकता न दरसल मेरे कंधे दुख रहे हैं।"
भौतिक ने सम्हल कर जवाब दिया क्योंकि वो आज ही के दिन अपने दो दोस्तों को नहीं खोना चाहता था।
"अह... चलो कम से कम तुम्हारा कंधा है तो मुझे तो मेरा कंधा महसूस ही नहीं हो रहा है।"
जतिन ने मुरझाया सा चेहरा बनाते हुए जवाब दिया।
"अर... समझ सकता हूँ।"
भौतिक ने उसे सांत्वना देने की कोशिश की।
अभी दोनों आपस में बातें करते हुए आगे बढ़ ही रहे थे कि जतिन फिर किसी से टकरा गया।
"हे भगवान्! फिर से नहीं।"
जतिन ने बुरी तरह अफसोस करते हुए बड़बड़ा कर कहा।
"ओये छछूंदर की औलाद आँख है या बटन सामने का कुछ दिखता है या नहीं।"
उसकी बरसाती मेंढ़क जैसी टर्र-टर्र की आवाज़ से भौतिक फौरन उस लड़के को पहचान लिया जिससे जतिन आज ही के दिन दूसरी बार टकराया था।वो और कोई नहीं वही बिक्रम था।
"हमारी तो आँखें ही हैं अपना चेक करवा लो!"
भौतिक ने आक्रोश और उद्दंडता से भरे लहजे में जवाब दिया और फौरन बिक्रम उसके करीब चला आया।
"सुन बे नाली के कीड़े।"
उसने अपनी उँगलियाँ लगभग भौतिक के नाक से सटाते हुए कहा और ये देखकर जतिन के हाथ-पैर फूलने लगे।
"बोल चिलगोजे की औलाद।"
भौतिक ने उसकी उँगलियों को दूर झिटक दिया खैर इससे पहले की दोनों आपस में गुँथ जाते, समय रहते उन्होंने प्रिंसिपल को वहाँ आते देख लिया।
"गुड आफ्टरनून सर!"
बिक्रम ने चापलूसी भरे अंदाज में कहा और उन दोनों पर कहर ढा़ती निगाह डालने के फौरन बाद वहाँ से चलता बना।
"बच्चों अपने-अपने क्लास में जाओ।"
कहने के साथ ही प्रिसिंपल मुस्कुराते हुए दूसरी तरफ देखने लगे।
खैर बिक्रम के जाते ही भौतिक भी तेजी से कदम बढ़ाते हुए हाॅस्टल की ओर चल पड़ा।
"तुमने उनकी नाक देखी वो किसी पकौड़े की तरह लाल थी और उनकी आँखों पर वो निशान कैसा था कल तक तो ऐसा कोई निशान नहीं था!है न?"
जतिन ने हैरानी भरे शब्दों में भौतिक से पूछा।
"हाँ क्योंकि ये निशान मेरे पापा ने उन्हें अभी-अभी दिया है और उनकी नाक भी पापा के वजह से लाल हुई है।"
भौतिक ने निराश होकर जवाब दिया जबकि जतिन बुरी तरह हैरान नजर आ रहा था।
"और फिर पता है हम जब भागते हुए गेट पर पहुंचे तो हमने देखा इसके पापा काॅलेज के दोनों गेटकीपर्स के साथ गुत्थमगुत्था थे और जब प्रिंसिपल सर वहाँ पहुँचे और उन्हें छुड़ाने की कोशिश की तो इसके पापा ने उनके नाक और आँख पर जबर्दस्त मुक्का जड़ दिया और बेचारे हमारे प्रिंसिपल अपनी नाक पकड़ के वहीं बैठ गए।"
शाम के वक्त अपने रूम में बैठा मनदीप हँसते हुए जतिन को सुबह का किस्सा सुना रहा था जबकि भौतिक सोने का नाटक कर रहा था।
"पर भौतिक के पापा उन दोनों से क्यों लड़ गये थे?"
जतिन ने भौतिक पर से अपनी नजर हटाते हुए मनदीप से सवाल किया।
"अर... वो गाँव से आये थे न तो उनके कपड़े और हाथ में लाठी देखकर उन दोनों गेटकीपर्स ने उन्हें भिखारी समझ लिया और काॅलेज में घुसने से रोक दिया और बस इसके पापा ने दोनों को पीट दिया।"
मनदीप ने हँसते हुए बताया जबकि जतिन खामोशी से बैठा सुनता रहा और फिर एक नजर भौतिक पर डालने के बाद अपने बैड पर जाकर लेट गया।
"आज का दिन बहुत बुरा गया है न दोस्तों?"
जतिन ने बैड पर लेटे-लेटे ही कहा।
"हुम्म!"
भौतिक ने धीरे से जवाब दिया और करवट बदल कर दीवार को घूरने लगा।
"मेरा तो नहीं।"
मनदीप ने चहकते हुए जवाब दिया।
"हाँ क्योंकि तुम्हें पूरे एक पीरियड अपने बेंच पर हाथ ऊपर करके खड़ा नहीं रहना पड़ा होगा है न!"
जतिन ने खामोशी से जवाब दिया।
"कम से कम ये काॅलेज के पहले ही दिन पहली ही क्लास में मुर्गा बनने से तो ज्यादा ही अच्छा है!"
मनदीप ने अफसोस जताते हुए बताया और उसकी बात सुनकर जतिन की नजरें उसकी ओर घूम गईं और फिर अचानक उसके चेहरे पर तेज मुस्कुराहट छा गई।
"हाँ वो तो है।"
जतिन ने आराम से जवाब दिया और छत को घूरने लगा।वक्त गुजरने के साथ-साथ अँधेरा और भी गहराता चला गया और उनकी थकी हुई आँखों को जल्दी ही नींद ने आ घेरा।
बहरहाल भौतिक की आँखों में नींद नहीं थी बल्कि वो शालिनी से हुए अपने झगड़े को लेकर अफसोस कर रहा था खैर जब शरीर थक चुका हो तो दिमाग कितनी देर संघर्ष करेगा आखिरकार उसकी पलकों ने भी नींद के आगे घुटने टेक दिये और प्रकृति एक पुराने दिन के अंत के साथ नये सवेरे की ओर बढ़ गयी।
और सोते ही भौतिक सपनों की दुनिया में खो गया और सपने में उसने देखा कि अगली सुबह फायर अलार्म बजने के बाद भी वो नहीं उठ पाया और हिटलर ने उसके हाथों और पैरों में बेड़ियाँ पहनाकर एक जंगली डायनासोर के पिंजरे में बंद कर दिया है और चारों तरफ जमा भीड़ जोर-जोर से तालियाँ बजा रही थी।
और फिर उसने सामने देखा और अचानक वो डायनासोर बिक्रम में बदल गया और फिर प्रिसिंपल में और फिर शमा में और फिर उसने हिटलर का रूप ले लिया और एक बार फिर वापस डायनासोर में और  अचानक वो डायनासोर नाचने लगा और फौरन झतिन में बदल गया और फिर दोबारा डायनासोर में बदल गया।
और फिर अचानक उसकी नींद खुल गई उसने चारों ओर देखा तो पाया कि बाकी दोनों अभी भी आराम से सो रहे थे और सुबह होने में अभी काफी वक्त बाकी था इसलिए करवट बदल कर वो दोबारा लेट गया।
अगली सुबह की पहली किरण के साथ फिर उसी फायर अलार्म की आवाज़ हाॅस्टल में गूँजने लगी और पलकें मींचते हुए भौतिक उठ गया जबकि बाकी दोनों पहले से ही उठ चुके थे।
"गुड मॉर्निंग!"
भौतिक ने मुस्कराते हुए दिन की शुरुआत की। 
"गुड मॉर्निंग!"
बाकी दोनों ने एक साथ जवाब दिया और फिर तीनों चल पड़े।
फ्रेश होकर बाकी स्टूडेंट्स के साथ वे तीनों भी ग्राउंड की ओर बढ़ गये जहाँ आज एक बार फिर उनका पाला हिटलर से पड़ने वाला था।
अपनी जगह पर लाइन में खड़े होने के बाद भौतिक के साथ-साथ बाकियों की नजरें भी हिटलर की ओर मुड़ गईं और ये देखकर किसी को भी हैरानी नहीं हुई कि हमेशा कि तरह आज भी उनका चेहरा सख्त और अनुशासित दिख रहा था।
"बेड नम्बर एक सौ बयालीस और तैंतालीस बाहर आईए।"
हिटलर ने ठंडे मगर जोरदार लहजे में पुकारा और भौतिक के साथ-साथ जतिन भी अपना बेड नम्बर सुनकर चौंक पड़ा पर दोनों में से कोई भी अपनी जगह से नहीं हिला।
"मैंने कहा बाहर आओ!"
इस बार उन्होंने तीखे मगर एक बार फिर ठंडे लहजे में पुकारा और इस बार दोनों सहमें हुए आगे आ गये।
"ग्राउंड के तीन चक्कर लगाओ अभी।"
हिटलर ने आदेश दिया जबकि दोनों एक दूसरे का मुँह ताकने लगे।
"पर क्यों हमने क्या किया?"
भौतिक ने वहीं डटे रहकर सवाल किया।
"पाँच चक्कर फौरन!"
हिटलर ने गुर्राकर कहा और मनदीप के साथ बाकी सब सहमे हुए देख रहे थे जबकि बिक्रम के चेहरे पर मुस्कान और भी चौड़ी हो रही थी।
"और हाँ अगली बार मुझसे या किसी भी टीचर से बात करते वक्त सर या फिर प्रोफेसर जरूर लगाना।"
कहने के साथ ही वे बाकी स्टूडेंट्स की ओर मुड़ गए जबकि भौतिक अपनी जगह से हिले बिना उन्हें घूरे जा रहा था और हर बढ़ते वक्त के साथ हिटलर के प्रति उसकी नफरत भी बढ़ रही थी।
हाँलाकि वो एक बार फिर कोई उल्टा जवाब देने वाला था लेकिन जतिन ने उसे रोक लिया।
पाँच चक्कर लगाने के बाद जब दोनों वापस पहुँचे तब तक आधे लड़के चेंज करने के बाद वापस अखाड़े में पहुंच चुके थे इसलिए वो भी चेंज करके सीधा वहीं पहुँच गए और पिछले दिन की सारी प्रक्रिया एक बार फिर दोहरायी गयी।
"हाहाहा! यार तेरे पापा तो साॅलिड हैं हाँ!"
कैंटीन में भौतिक, जतिन, मनदीप और दो-एक लड़कों के साथ बैठी शमा ने खिलखिलाकर हँसते हुए कहा।
"मतलब बेचारे हमारे प्रिंसी की तो माँ की आँख कर दी तेरे पापा ने।"
"शमा अब तू बस कर यार!"
मनदीप ने अपने चेहरे पर उभर रही मुस्कुराहट रोकने की कोशिश करते हुए कहा।
"मैं जा रहा हूँ!"
गुस्से में भड़का हुआ भौतिक वहाँ से उठकर जाने लगा पर शमा ने उसका हाथ पकड़ कर उसे रोक दिया।
"अच्छा चल साॅरी अब नहीं बोलूँगी।"
उसने अपने चेहरे पर उभर रही जोरदार हँसी रोकते हुए कहा पर वो इसमें कामयाब नहीं हो पायी और सब एकसाथ हँस पड़े।
और इसका नतीजा ये हुआ कि गुस्से में पैर पटकता हुआ भौतिक वहाँ से निकल गया।जबकि बाकी सब आपस में बातें करते हुए काफी देर तक हँसते रहे।
"ओये भौतिक!भौतिक रुक तो।"
दोपहर की क्लास खत्म करके वापस कैंटीन की ओर बढ़ रहे भौतिक के कदम एक बार फिर शमा की आवाज़ सुनकर ठिठक गए।
"क्या है अब क्या बोलना है?"
भौतिक ने चिढ़ते हुए पूछा।
"प.....पुतिन ने तेरे और शालिनी के झगड़े के बारे में बताया तूने ऐसा क्यों किया वो सुबह से आपने रूम में बैठी रो रही है।"
शमा ने उसे फटकार लगाई और ये सुनकर भौतिक का चेहरा एकबार फिर शर्म से लाल हो गया।
"अ.... मैं..... मैं दरसल सुबह से उसे खोज रहा हूँ माफी माँगने के लिए पर वो नहीं मिली तो मैं कर भी क्या सकता हूँ।"
भौतिक ने कंधे उचकाकर जवाब दिया।
"हुमम्!ये ले मेरी वाॅकी-टाॅकी रख मेरे पास एक प्लान  है आज रात के लिए।"
शमा ने वाॅकी-टाॅकी उसकी ओर बढा़ते हुए कहा।
"इसका मैं क्या करूंगा?"
भौतिक ने हैरानी से उसे घूरते हुए सवाल किया।
"अरे बुद्धू इसका दूसरा पीस मेरे पास है जिससे आज रात को मैं तुझे मैसेज दूँगी और तब तू हाॅस्टल के बाहर आ जाना और हुमम् अगर आना चाहे तो मनदीप और पुतिन को भी ले आना।"
"पर क्यों... अर... "
"बाय!रात में मिलते हैं।" 
कहने के साथ ही शमा तेजी से वापस चली गई और सोंच में डूबा भौतिक बड़बड़ाता हुआ हाॅस्टल की ओर चल पड़ा।
"ये पक्का मरवायेगी मुझे!"
हाॅस्टल में वापिस जाकर उसने पूरी बात मनदीप और जतिन को बता दी।
"मुझे भी बुलाया है?"
जतिन ने उत्साहित होकर पूछा।
"हाँ!"
भौतिक का जवाब सुनकर जतिन बहुत खुश और उत्साहित नजर आने लगा जबकि मनदीप एकदम खामोश और सहमा हुआ उलझन में नजर आने लगा।
"तुम दोनों का दिमाग खराब हो गया है तुम्हें फता भी है तुम लोग क्या करने जा रहे हो हिटलर को पता चला तो सीधे रिस्टीकेट कर देगा।"
मनदीप ने दोनों को समझाने की कोशिश की।
"उन्हें बतायेगा कौन?"
कहने के साथ ही दोनों ने आपनी आँखें उसके चेहरे पर गडा़ दीं।दरअसल दो बार हिटलर से सजा मिलने के बाद भौतिक थोड़ा या शायद बहुत ज्यादा 
दुस्साहसी हो गया था।
"तुम दोनों पागल हो गये हो और मैं ऐसे कासी पागलपन में तुम्हारा साथ नहीं देने वाला।"
मनदीप ने आखिरी बार अपना फैसला सुनाया और डिनर के लिए कमरे से निकलकर हाॅलरूम की ओर चल पड़ा और बाकी दोनों भी उसके पीछे हो लिए जबकि उनमें से किसी की भी नजर बाहर दरवाज़े के पीछे उन एक जोड़ी गहरे काले जूतों पर नहीं पडी़ जो किसी के पैरों में थे और वो न जाने कब से उनकी बातें सुन रहा था।
"आज का डिनर अच्छा था है न!"
डिनर के बाद वापस अपने रूम में लौटते वक्त जतिन ने पूछा।
"हुमम्!"
मनदीप ने धीरे से सिर हिलाकर हाँ में जवाब दिया।
पनीर की मिठाई और कमलकंद का शोरबा दोनों काफी लजीज थे।"
भौतिक ने चटकारा लेते हुए बताया।
"हाँ और आलू की टिक्की और बतख के अंडे भूर्जी भी काफी स्वादिष्ट थी।"
जतिन ने अपने होंठों पर जुबान फिराकर जवाब दिया।
"तुम दोनों कुछ भी कर लो मैं नहीं जाने वाला।"
कहने के साथ ही मनदीप अपने बेड कर लेट गया और छत को घूरने लगा।
बहरहाल ठीक रात के बारह बजे गहरे अँधेरे और पैने सन्नाटे के बीच अचानक भौतिक के हाथ में मौजूद वाॅकी-टाॅकी पर शमा की खरखराती हुई आवाज़ उभरी।
"हैलो... घर्रर्र.... कहाँ हो... घर्रर्र.... तुम लोग....?" 
"अर.... हम तीनों... घर्रर्र घर्रर्र... अर ग्राउंड की ओर आ रहे हैं।"
भौतिक ने जवाब दिया।
""बहुत अच्छे जल्दी आओ!"
कहने के साथ ही शमा की चहकती हुई आवाज़ आनी बंद हो गई।
"मैंनें पहले ही कहा था आज हम बुरे फँसने वाले हैं!"
मनदीप ने रोतली सी शक्ल बनाते हुए कहा।
"देखो दोस्त तुम्हारा आना जरूरी था क्योंकि हम नये हैं और यहाँ के रास्ते अभी हमें ठीक से नहीं मालूम जबकि तुम्हारे साथ ऐसी कोई समस्या नहीं है।"
भौतिक ने उसे उकसाते हुए कहा।
"तुम्हें क्या लगता है मैं हर रोज़ रात को अँधेरे में छिपकर लड़कियों से मिलने गर्ल्स हॉस्टल जाता हूँ!"
मनदीप ने चिढ़ते हुए जवाब दिया।
"अर.... दरसल हमारा वो मतलब बिल्कुल भी नहीं था।"
जतिन ने उसे समझाने की कोशिश की और तीनों अँधेरे में एक पेंसिल टाॅर्च के सहारे आगे बढ़ रहे थे मगर उनमें से किसी को जरा भी अंदाजा नहीं था कि कोई चौथा शख्स उनसे कुछ कदम की दूरी पर मौजूद था और काफी़ देर से उनका पीछा भी कर रहा था।और उसके पैरों में भी वही एक जोड़ी गहरे काले जूते थे।
"अब तो बता दो हम कहाँ जा रहे हैं और प्लान क्या है?"
मनदीप ने चालीसवीं बार अपना सवाल दोहराया और भौतिक ने कुछ बोलने के लिए मुँह खोला और फिर बंद कर लिया।
"अर... दरसल हम शालिनी की सरप्राइज बर्थ-डे पार्टी में जा रहे हैं।"
"क्या!और ये बात तुमने हमें पहले क्यों नहीं बताई?"
मनदीप और जतिन ने उससे एकसाथ कोरस में सवाल किया।
"अर... क्योंकि मुझे भी अभी कुछ वक्त पहले ही पता चला है।"
भौतिक ने हिचकते हुए जवाब दिया और अचानक बातों ही बातों में भौतिक एकसे खामोश हो गया और बेहद तेजी के साथ दायीं ओर घूम गया और उसी के साथ उसकी पेंसिल टार्च भी उसी दिशा में मुड़ गई।
"क्या हुआ?"
बाकी दोनों ने एकसाथ पेंसिल टार्च की रोशनी में घूरते हुए पूछा।
"कुछ नहीं!"
भौतिक ने माथे पर शिकन लाते हुए जवाब दिया और इससे पहले कि वो या कोई और कुछ बोलता शमा की आवाज़ उनके कानों में पडी़।
"यहाँ आ जाओ दोस्तों!"
और तीनों शमा की ओर बढ़ गये और एक बार फिर वो एक जोड़ी काले जूते पेड़ के पीछे से बाहर आ गएऔर इस बार भी उनमें से किसी की भी नजर उसपर नहीं पडी़ ... To Be Continue In next Chapter

                                    Written By
                         Manish Pandey’Rudra

©manish/pandey/11-05-2018

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